अतीत के पन्नों में भवाली की राजनैतिक व साहित्यिक भागीदारी

जिक्र भवाली चौराहे का आता है, तो कई यादें दिलो-दिमाग पर तैरने लगती हैं. भवाली का इतिहास, आजादी के पूर्व स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका, स्वातंत्रोत्तर भारत में इसके विकास की दशा एवं दिशा, कई नामी शख्सियतों की जन्म व कर्मभूमि तथा आज की भवाली का निखरा रूप. बुजुर्ग तो यहां तक बताते हैं कि भवाली, शुरूआती दौर में श्मशान घाट के रूप में विकसित हुआ. कभी ’’भवाली का गधेरा’’ एक गाली के रूप में प्रयोग होता रहा. कहते हैं कि नैनीताल शहर जो गोरों का प्रिय शहर था, वहां उन्नीसवीं सदी में कोई संक्रामक बीमारी महामारी के रूप में फैली, तब हिन्दुस्तानियों की लाशों के संक्रमण से स्वयं को बचाने के लिए नैनीताल शहर से 11 किमी दूर भवाली को लाशों को जलाने व दफनाने के लिए इस स्थान को चुना गया. यह भी कहा जाता है कि भवाली का वर्तमान श्मशानघाट पहले रेहड़ को जाने वाली रोड के नीचे बम पुलिस के कहीं आस-पास हुआ करता था, बाद के वर्षों में वर्तमान देवी मन्दिर के पास तथा अन्त में रानीखेत रोड पर पवित्र उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी के तट पर टीकापुर नामक स्थान पर ले जाया गया.
(Famous personalities of Bhowali)

इस बात से एक तथ्य यह भी सामने आता है कि जब सन् 1841 में नैनीताल की खोज के बाद नैनीताल में बसासत शुरू हुई होगी तो उसके बाद ही भवाली कस्बा वजूद में आया होगा. अगर इस थ्योरी को सच माना जाय तो भवाली का इतिहास 150-200 साल से अधिक पुराना नहीं होगा.

भवाली शहर के उत्तरोत्तर विकास के पीछे सामाजिक, राजनैतिक, साहित्यिक, प्रशासनिक, धार्मिक आदि कई कारक रहे हैं. स्वतंत्रता संग्राम में भवाली ने भी अपने हिस्से का पूरा योगदान देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. भारत रत्न पं0 गोबिन्द बल्लभ पन्त के स्वतंत्रता आन्दोलन का गवाह रहा भवाली कस्बे का तिराहा उनकी सार्वजनिक सभाओं का केन्द्र रहता. आज भी उनकी याद में भवाली चौराहे पर उनकी प्रतिमा इसकी याद में प्रतिस्थापित है. उन्होंने पन्त इस्टेट नाम से भवाली बाजार के सामने की पहाड़ी पर अपना आवास बनाया तथा उनके सुपत्र कृष्ण चन्द्र पन्त का जन्म भी 10 अगस्त 1931 को भवाली में ही हुआ. पं0 पन्त से ही प्रेरणा लेकर भवाली के उस समय के युवकों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आक्रोश बढ़ा और कई स्थानीय युवक स्वतंत्रता संग्राम में उनके अनुयायी बन गये.

स्व. हीरा लाल भवाली के एक ऐसे ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. पं0 जवाहर लाल नेहरू से उनका घनिष्ठ संबंध था. कमला नेहरू क्षयरोगाश्रम भवाली सेनेटोरियम में भर्ती थी, भवाली सेनेटोरियम में अंग्रेज चिकित्सक एल.एस. व्हाइट तथा चर्चित चिकित्सक डॉ. प्रेम लाल साह की देखरेख में श्रीमती कमला नेहरू का उपचार चल रहा था. कमला नेहरू के आउट डोर मरीज के रूप में डॉ. प्रेम लाल साह जब उनका उपचार करते तो श्रीमती कमला नेहरू स्वतंत्रता सेनानी हीरा लाल साह जी के आवास पर रहा करती.

पूर्व पुलिस महानिरीक्षक उ.प्र. शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने अपने फेसबुक वाल पर ये जानकारी साझा करते हुए बताया है कि जब अपनी पत्नी का हाल-चाल जानने पं. नेहरू सेनेटोरियम आया करते थे तो अपनी बेटी इन्दिरा को भी साथ लाते, इन्दिरा इस दरम्यान हीरा लाल साह जी के आवास पर ही रहा करती. हीरा लाल साह जी के वंशज अब भवाली में नहीं रहते हैं, उनके वंशजों में वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार स्व. कैलाश साह जी भी थे, जिनका परिवार अब दिल्ली में ही रहता है. साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान का उल्लेख इसी लेख में आगे किया गया है.
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भवाली सेनेटोरियम मे कमला नेहरू साथ मे खड़े डॉ0 प्रेम लाल साह. फोटो – शैलेंद्र प्रतापसिंह के फ़ेसबुक पेज से साभार

 स्व. वंशी लाल कंसल भी स्वतंत्रता संग्राम में कस्बे के अग्रणीय नेताओं में शुमार थे. बताते हैं कि इनके पिता बाबू राम कंसल भी स्वतंत्रता सेनानी रहे. स्व. वंशीलाल कंसल नैनीताल में जिस हम्फ्री स्कूल (वर्तमान-चेतराम साह इन्टर कालेज) में पड़ते थे वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराने पर उन्हें स्कूल से निष्कासित कर दिया तथा ब्रिटिश शासन विरोधी गतिविधियों में सक्रियता के कारण ही उनकी नैनीताल की सम्पत्ति कुर्क कर दी गयी और वे भवाली आकर बस गये. 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में जेल गये थे तथा इन्दिरा गांधी के शासनकाल में उन्हें ताम्रपत्र के सम्मान से नवाजा गया था. भवाली चौराहे के सामने उन्होंने मिठाई की एक छोटी सी दुकान खोलकर इसे अपनी आजीविका का जरिया बनाया, जो बदस्तूर आज भी उनके पोते विपुल मिष्ठान्न भण्डार नाम से चला रहे हैं, जबकि उनके बड़े पुत्र हरि शंकर कंसल बतौर अधिवक्ता नैनीताल जिला न्यायालय व उच्च न्यायालय में वकालत करते हैं तथा कई कार्यकालों में जिला बार एसोसियेशन के अध्यक्ष रह चुके हैं.

स्व. पान सिंह नेगी, जो भवाली में आढ़त का धन्धा करते थे, एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे, इनके अलावा स्व. देब सिंह भाकुनी स्व. नरोत्तम भट्ट, स्व. शेरी राम आर्य, स्व. परसी लाल, साह, स्व. प्रेम सिंह बिष्ट आदि ने भी स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ-चढ़कर हिस्सा लिया. भवाली से ही कुमाऊं का प्रवेश द्वार हुआ करता, जिससे इस कस्बे का जनजागरण सूदूर पहाड़ों तक अपनी गूंज छोड़ता.
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बंशीलाल कंसल तथा अन्य स्वतंत्रता सेनानी. फोटो : राकेश बेलवाल की फ़ेसबुक वाल से

भवाली चौराहे से ऊपर को गांधी कालोनी की ओर चढ़ती सड़क के कॉर्नर पर शेखर दुर्गापाल जी की मशहूर पान की दुकान हुआ करती थी, जिसके करीब आज शू स्टोर है. साठ के दशक में शेखर दुर्गापाल जी की एक लाख की लॉटरी निकली थी. उस समय एक लाख रूपये की रकम बहुत हुआ करती, इसलिए क्षेत्र में इसकी काफी चर्चा रही. ऊपर को चढ़ती रोड पर थोड़ा आगे बढ़ने पर बाई ओर हरमिटेज कॉटेज नामक कोठी के बाहर बोर्ड लगा होता –डॉ. के.सी. पन्त के निवास का. डॉ. के.सी. पन्त आईवीआरआई में डॉक्टर थे, लेकिन ये मात्र एक चिकित्सक का आवास न होकर साहित्य जगत की कई हस्तियों का आशियाना भी रहा.

डॉ. के.सी. पन्त के बड़े पुत्र मुक्तेश पन्त ने मुक्त गगन के पंछी बनकर अपनी फक्कड़ी व यायावरी के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा, कई समाचार पत्रों में पत्रकारिता के साथ ही उन्होंने 1982-83 में ’हिल रिव्यू’ नामक अखबार हल्द्वानी से निकाला तथा नब्बे के दशक में ’ओपिनियन एक्सप्रेस’’ के संपादक की भूमिका भी निभाई. समाज, राजनीति, इतिहास, संस्कृति जैसे हर विषय पर दखल रखने वाले मुक्तेश पन्त के बारे में आम लोगों की धारणा है कि उनका विद्रोही स्वभाव ही उन्हें किसी एक दिशा में एकाग्र नहीं कर पाया, अन्यथा वे भी राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर बड़ा मुकाम हासिल करते. उनके अनुज पद्मश्री प्रो0 पुष्पेश पन्त किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. अन्तर्राष्ट्रीय संबधों के जानकार, जाने माने शिक्षाविद् होने के साथ-साथ पाककला में भी विशेष दखल रखते हैं. देश के शीर्षस्थ विश्वविद्यालय जेएनयू में इन्टरनेशनल रिलेशन में प्रोफेसर से सेवानिवृत्ति ले चुके, प्रो. पन्त आज भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अपने लेख व स्तम्भकार के रूप में साहित्य जगत को अपनी सेवायें दे रहे हैं.

इसी परिवार से नजदीकी ताल्लुक रखने वाली प्रो. पन्त की मौसी प्रख्यात उपन्यासकार शिवानी (गौरा पन्त) का भी भवाली में डॉ. के.सी. पन्त के यहां आना-जाना हुआ करता था, बाद में शिवानी की बेटी पद्मश्री मृणाल पाण्डे, जिनकी प्रारम्भिक शिक्षा नैनीताल में ही हुई, तथा उनकी बहिन डॉ. इरा पन्त का भी इस घर से जुड़ाव रहा है. प्रो. पुष्पेश पन्त तो अब दिल्ली के होकर रह गये हैं, लेकिन उनके अग्रज मुक्तेश पन्त ने 1999 में दिल्ली छोड़कर अपने पैतृक निवास भवाली में रहना शुरू किया. दुर्भाग्यवश वर्ष 2003 में यह ऐतिहासिक मकान आग की भेंट चढ़ गया और मुक्तेश पन्त हल्द्वानी में ही आवास बनाकर रहने लगे हैं. शिवानी की आत्मकथात्मक कहानी  लाटी भी गेठिया सेनेटोरियम की पृष्ठभूमि में लिखी गयी है, जो भवाली व ज्योलीकोट कस्बों के बीच पड़ता है.

भवाली से लगभग 11 किमी. की दूरी पर स्थित रामगढ़ एक प्रमुख फल पट्टी के साथ ही कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर का प्रवास होने का गौरव भी समेटे हैं. टैगोर ने नोबेल पुरस्कार प्राप्त कृति गीतांजलि के कुछ अंश रामगढ़ में ही लिखे तथा आधुनिक विज्ञान पर आधारित ग्रन्थ विश्व परिचय की रचना भी रामगढ़ प्रवास पर की. वे वर्ष 1903, 1914 तथा 1937 में उत्तराखण्ड आये. उनके शिष्य डेनियल ने रामगढ़ की सबसे ऊंची चोटी पर उनके आवास के लिए एक भवन बनाया, यह चोटी आज भी टैगौर टॉप के नाम से जानी जाती है. बताते है कि गुरूदेव टैगोर शान्ति निकेतन की स्थापना भी इसी रामगढ़ में करना चाहते थे, लेकिन यह इस क्षेत्र का दुर्भाग्य रहा कि क्षयरोग से पीड़ित उनकी बेटी का स्वास्थ्य निरन्तर खराब होने लगा, जिसकारण उन्हें यहां से जाना पड़ा और उनका यह सपना अधूरा ही रह गया.

रामगढ़ की उत्तुंग पर्वत श्रृखलाऐं तथा सामने पर्वतराज हिमालय का मनोहारी दृश्य प्रकृति के चितेरों को लुभाता रहा है. छायावादी काव्य के प्रमुख स्तंभों में से एक महादेवी वर्मा का भी रामगढ़ से विशेष लगाव रहा. दरअसल टैगोर ने ही महादेवी वर्मा को रामगढ़ के प्राकृतिक सौन्दर्य से प्रभावित होकर यहां आने की सलाह दी थी. वर्ष 1936 में महादेवी वर्मा ने उमागढ़ के देवीधार नामक चोटी पर अपना ग्रीष्मकालीन प्रवास बनवाया जिसे ’’मीरा कुटीर’’ नाम दिया गया. 1965 तक वे ग्रीष्मकालीन प्रवास पर प्रतिवर्ष यहां आया करती थी. उन्होंने यहां रहते हुए न केवल पहाड़ की महिलाओं की व्यथा-कथा को अपने साहित्य में चित्रित किया बल्कि हर साल वे अपने साथ दो-तीन लड़कियों को पढ़ाने इलाहाबाद ले जाती थी, जो बाद में अध्यापिका बनी. यहां तक कि उनके घरेलू अनपढ़ नौकर ने उनकी प्रेरणा व सहयोग से स्नातकोत्तर तक की पढाई की. महादेवी वर्मा की कृति दीपशिखा उनकी इसी मीरा कुटीर में रची गई. उनके रामगढ प्रवास के दौरान हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार सुमित्रानन्दन पन्त, इला चन्द्र जोशी, धर्मवीर भारती आदि का भी प्रायः यहां आना-जाना हुआ करता था.

1987 में महादेवी वर्मा की मृत्यु के बाद उनकी इस विरासत को बचाये रखने के लिए वरिष्ठ कथाकार प्रो0 लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही के सद्प्रयासों से मीरा कुटीर में  महादेवी वर्मा सृजन पीठ की स्थापना की गयी, जो आज भी संचालित है और समय-समय पर साहित्यिक गतिविधियां संचालित होते रहती हैं. इस सृजन पीठ की स्थापना में जिस जद्दोजहद से प्रो. बटरोही को दो चार होना पड़ा, वह दास्तां महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संस्थापक प्रो. बटरोही, काफल ट्री में अपने लेख में बयां कर चुके हैं. दुर्दशा का शिकार महादेवी वर्मा सृजन पीठ

पत्रकारिता व साहित्य के क्षेत्र में भवाली के भौनियाधार निवासी स्व. कैलाश साह व उनके अनुज स्व. महेन्द्र साह ने भी भवाली को साहित्यिक पहचान दी. स्व. कैलाश साह ने नैनीताल से प्रकाशित होने वाले पहाड़ के पहले दैनिक समाचार पत्र दैनिक पर्वतीय से पत्रकारिता की शुरूआत कर शीघ्र ही राष्ट्रीय फलक पर पत्रकारिता व विज्ञान कथा लेखन के क्षेत्र में अपना विशिष्ट मुकाम हासिल किया. साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादक मनोहर श्याम जोशी, कैलाश साह तथा देवेन्द्र मेवाड़ी की तिकड़ी ने विज्ञान कथा के लेखन की जो शुरूआत की तो पीछे मुड़कर नहीं देखा.

मनोहर श्याम जोशी तो विज्ञान कथा लेखन सिद्धहस्त थे ही, कैलाश साह व देवेन्द्र मेवाड़ी को विज्ञान कथा लेखन से जोड़ने में उन्होंने उत्प्रेरक का काम किया. नैनीताल छोड़कर दिल्ली जाने पर कैलाश साह का प्रारम्भिक दौर आर्थिक रूप से बहुत संघर्षपूर्ण रहा. दिल्ली के नामी अस्पतालों में कन्धे पर टेपरिकार्डर लटकाकर वे चिकित्सकों से चर्चा का ध्वन्याकंन करते और फिर घर पर आकर उसे लिखते. साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादक मनोहर श्याम जोशी उनकी खोजपूर्ण लेखों को अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर न केवल लेखन के क्षेत्र में उन्हें प्रोत्साहित करते, बल्कि उनके अर्थतंत्र को भी सबल देते.
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कैलाश साह. फोटो : अर्णिमा

विज्ञान कथा संग्रह मृत्युंजयी के अलावा मशीनों का मसीहा विज्ञान कथा जो साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुई, काफी चर्चित रही. स्व. कैलाश साह के व्यक्तित्व को केवल एक पत्रकार अथवा विज्ञान कथा लेखक तक सीमित करना उनके व्यक्त्वि के साथ नाइंसाफी होगी. बकौल देवेन्द्र मेवाड़ी – एक अनोखी शख्शियत थे कैलास साह, एक में अनेक थे वे, किसी के लिए पत्रकार, किसी के लिए समर्पित विज्ञान लेखक, किसी के लिए गजब के किस्सागो, किसी के लिए हमदर्द दोस्त तो किसी के लिए एक मददगार इन्सान. काफल ट्री में देवेन्द्र मेवाड़ी स्व0 कैलाश साह पर विस्तार से लिख चुके हैं :  कैलाश साह यानि कैलाश दाज्यू             

बाद में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती गंगा साह ने भी नवभारत टाइम्स में काम किया. बात सन् 1984 के अक्टूबर माह की है, मुझे विद्यालय के किसी कार्य से दिल्ली जाना था, पत्नी भी मेरे साथ थी. कैलाश साह जी की सुपत्री अर्पिता सैनिक विद्यालय के छात्रावास में रहती थी, दीपावाली अवकाश पर उन्हें अपनी माँ के पास दिल्ली जाना था, प्रधानाचार्य कला बिष्ट जी ने कहा कि दिल्ली में अर्पिता को भी उसके घर छोड़ देना. तब कैलाश साह जी तो रहे नहीं थे, उनकी धर्मपत्नी गंगा दीदी ने राजेन्द्र नगर, गोल चक्कर के पास स्थित घर पर आत्मीयता से हमारा स्वागत सत्कार किया. संयोगवश उसी दिन उनके पारिवारिक मित्र मनोहर श्याम जोशी द्वारा दूरदर्शन के लिए लिखे गये लोकप्रिय नाटक हम लोग का पहला एपिसोड प्रसारित होना था. सभी परिजन देखने के लिए उत्सुक थे, हमें भी हमलोग का पहला एपिसोड उन्हीं के घर पर देखने का सौभाग्य मिला.  
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वर्तमान दौर में भवाली के लक्ष्मी खन्ना ’सुमन’ भी साहित्य के क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे हैं. बालसाहित्य व गजल विधा के साहित्यसेवी अब तक कई मंचों से सम्मान पा चुके हैं. इस बीच उ.प्र. के निवत्र्तमान पुलिस महानिरीक्षक शैलेन्द्र प्रताप सिंह के घोड़ाखाल में बसने से, उनकी कलम से भवाली के पुराने इतिहास को खंगालने की मुहिम जारी है. भवाली के पुराने इतिहास, जिसकी जानकारी से स्थानीय लोग भी वाकिफ नहीं है, वे अपनी फेसबुक पेज के माध्यम से खोजपूर्ण जानकारियां साझा करते आये हैं और उम्मीद करते हैं कि निकट भविष्य में उनकी लेखनी से अतीत के गत्र्त में दफन कुछ रोचक जानकारियां पाठकों के सम्मुख आयेंगी.
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जारी…

सन्दर्भ साहित्य:-
1- ’हल्द्वानी लाइव’ के ब्लाग में प्रकाशित लेख ’मुक्तेश पन्त मुक्त गगन का पंछी’, 10 जनवरी 2012
2- जनादेश- 2019, कहानी एक पहाड़ी शहर की, (लेखक-शैलेन्द्र प्रताप सिंह,पूर्व आइजी, (पुलिस) उ.प्र).
3- प्रो. राकेश बेलवाल, की फेसबुक वाल
4- हिलवाणी- एक कस्बे की याद लेखक – चन्द्रशेखर तिवारी, रिसर्च एसोसियेट, दून पुस्तकालय देहरादून

पिछली कड़ी : अतीत के पन्नों में भवाली की दो बहिनें ब्लोसम और ब्लांची

– भुवन चन्द्र पन्त

भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं.

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September 26, 2020 at 09:36AM
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